1) साधन एवं उपकरण
उद्देश्य: अभियांत्रिकी विभाग में उपयोग किए जाने वाले सभी साधनों एवं उपकरणों की पहचान कराना।
क्रिया: अभियांत्रिकी विभाग में उपलब्ध सभी उपकरणों और साधनों की पहचान की गई तथा वे कैसे कार्य करते हैं, यह समझा गया।
आर्क वेल्डिंग: ₹5000/-
CO₂ वेल्डिंग: ₹8000/-
CO₂ वेल्डिंग का अर्थ कार्बन डाइऑक्साइड वेल्डिंग है, जिसमें CO₂ गैस का उपयोग किया जाता है। यह प्रक्रिया सामान्यतः स्टील और अन्य धातुओं की वेल्डिंग के लिए प्रयोग की जाती है।
TIG वेल्डिंग:
TIG वेल्डिंग (टंगस्टन इनर्ट गैस वेल्डिंग) में टंगस्टन इलेक्ट्रोड का उपयोग किया जाता है और गैस के माध्यम से वेल्डिंग प्रक्रिया को सुरक्षित रखा जाता है।
कीमत: ₹2000/-
2) बेंच ग्राइंडर मशीन: ₹8000/-
वेल्डिंग जॉइंट्स को समतल करने, सतह से कठोर या खराब सामग्री हटाने तथा आकार में सुधार करने के लिए उपयोगी। यह ग्राइंडिंग के लिए उपयुक्त मशीन है।
3) पाइप कटर मशीन: ₹15000/-
विभिन्न आकार और सामग्री के पाइप काटने के लिए उपयोग की जाती है। पाइप लाइन इंस्टॉलेशन और रेट्रोफिटिंग में सहायक। वेल्डिंग या अन्य प्रक्रियाओं के लिए पाइप को उपयुक्त आकार में तैयार करने हेतु प्रयोग की जाती है।
4) आयरन (लोखंड): ₹7000/-
आयरन (लोखंड) एक महत्वपूर्ण धातु है। इसका उपयोग किसी भी लोहे की वस्तु को सीधा करने के लिए किया जाता है या उस पर रखकर/ठोककर उसे मोड़ा जा सकता है।
5) वेल्डिंग साइड टेबल: ₹30000/-
वेल्डिंग करते समय वस्तु को हिलने से रोकने के लिए, विभिन्न वजन के धातु भागों को सुरक्षित रखने के लिए तथा वेल्डर को आरामदायक ऊँचाई पर काम करने में सहायता के लिए उपयोगी।
6) मिलिंग मशीन:
यह एक प्रकार की यांत्रिक मशीन है, जो विभिन्न धातुओं या अन्य पदार्थों की सतह से सामग्री हटाने (कटिंग/शेपिंग) का कार्य करती है।
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2) मापन
उद्देश्य: मापन से संबंधित सभी जानकारी जानना आवश्यक है तथा मापन को सही और सटीक तरीके से कर पाना।
मापन करने की सामग्री:
मेज़रिंग टेप, स्केल, वजन काँटा, गेज।
प्रकार:
मापन के निम्नलिखित दो प्रकार होते हैं—
ब्रिटिश पद्धति:
इस पद्धति में मापन फुट, इंच, कोस, गुंठा, खंडी, मण आदि में किया जाता है। ये माप ब्रिटिश काल में उपयोग में लाए जाते थे, इसलिए इस मापन प्रणाली को ब्रिटिश पद्धति कहा जाता है।
मैट्रिक पद्धति:
इस पद्धति में मापन mm, cm, km, लीटर आदि में किया जाता है। वर्तमान समय में इस पद्धति का उपयोग अधिक मात्रा में किया जाता है।
मापन के सूत्र – मैट्रिक पद्धति
cm
1 cm = 10 mm
1 in = 2.5 cm
1 m = 100 cm
फुट (Ft)
1 mm = 0.001 m
1 cm = 0.01 m
1 in = 0.0254 m
1 ft = 0.3048 m
मापन के सूत्र – ब्रिटिश पद्धति
1 kg = 1000 gm
gm = ग्राम
kg = किलोग्राम, यह भार (वजन) मापने की इकाई है।
ml = मिली लीटर
L = लीटर, यह द्रव मापने की इकाई है।
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3) पाउडर कोटिंग
पाउडर कोटिंग का अर्थ है—यदि किसी धातु को रंगना हो, तो पाउडर कोटिंग मशीन का उपयोग करके उस वस्तु या धातु पर रंग किया जाता है। पाउडर कोटिंग करते समय सुरक्षा उपकरणों का होना और उनका उपयोग करना अत्यंत आवश्यक है। इस मशीन के माध्यम से धातु पर रंग चढ़ाया जाता है। पाउडर कोटिंग में प्रयुक्त रंग पाउडर (चूर्ण) के रूप में होता है।
धातु पर रंग को चिपकाने के लिए एक ओवन का उपयोग किया जाता है। जब धातु को ओवन में रखा जाता है, तो पाउडर गर्म होकर पिघल जाता है और धातु की सतह पर अच्छी तरह चिपक जाता है।
सामग्री:
थ्री इन वन एसिड, हैंड ग्लव्स, गॉगल, जिस वस्तु पर पाउडर कोटिंग करनी है वह वस्तु।
प्रक्रिया:
निर्धारित किया गया समय पूरा होने पर ओवन अपने आप बंद हो जाता है और मशीन भी स्वतः बंद हो जाती है।
1.सबसे पहले धातु को अच्छी तरह से पॉलिश किया जाता है।
2.पॉलिश करने के बाद 3 इन 1 एसिड की सहायता से उस पर लगा जंग हटाया जाता है।
3.इसके बाद पानी से अच्छी तरह धोकर उसे 10–15 मिनट तक सूखने के लिए छोड़ दिया जाता है।
4.फिर आवश्यक रंग की पाउडर ली जाती है।
5.उसके बाद ज़मीन पर बड़ा कार्पेट बिछाया जाता है, ताकि नीचे गिरने वाली रंग पाउडर व्यर्थ न जाए और खराब न हो।
6.फिर कंप्रेसर चालू करके हवा के दबाव से धातु पर रंग की फुहार की जाती है।
7.इसके बाद ओवन को चालू करके सेट किया जाता है, जिससे धातु पर लगा रंग गर्म होकर उस पर चिपक जाता है।
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4) रंगकाम
रंगकाम का अर्थ है—यदि किसी वस्तु पर जंग लग गया हो या किसी लोहे की वस्तु की आयु बढ़ानी हो, तो उस वस्तु पर रंग लगाया जाता है। इसी प्रक्रिया को रंगकाम कहा जाता है।
रंगकाम केवल औद्योगिक कार्यों के लिए ही नहीं, बल्कि दीवारों और संरचनाओं की सुरक्षा के लिए भी किया जाता है।
1) रंगकाम के प्रकार :
1.ऑयल पेंट (Oil Paint) – तेलयुक्त रंग, अधिक टिकाऊ होता है।
2.डिस्टेंपर (Distemper) – पानी में घुलने वाला रंग, मुख्यतः दीवारों के लिए।
3.एक्रेलिक पेंट (Acrylic Paint) – पानी और तेल, दोनों प्रकार में उपलब्ध होता है।
4.एनामेल पेंट (Enamel Paint) – लोहे की वस्तुओं पर उपयोग किया जाने वाला रंग।
5.सीमेंट पेंट (Cement Paint) – बाहरी दीवारों पर उपयोग किया जाने वाला रंग।
2) रंगकाम के थर :
रंगकाम करते समय अलग-अलग थर लगाए जाते हैं। कुल मिलाकर तीन थर होते हैं—
1. प्राइमर – दीवार या सतह पर रंग को अच्छी तरह पकड़ दिलाने के लिए आधार परत।
2.अंडरकोट – मुख्य रंग के लिए आधार तैयार करने वाली परत।
3.टॉप कोट – अंतिम रंग की परत, जो सुंदरता और टिकाऊपन प्रदान करती है।
3) आवश्यक साधन :
- ब्रश
- रोलर
- पेंट की ट्रे (पत्रा)
- पॉलिश पेपर (सैंड पेपर)
- प्राइमर और पुट्टी
- कपड़ा (फडका)
- झाड़ू
- सुरक्षा उपकरण
4) दीवार की पूर्व तैयारी :
- दीवार की गंदगी, धूल और पुराने रंग के टुकड़े घिसकर हटाना।
- पॉलिश पेपर से दीवार को चिकना और साफ करना।
- दरारों और छिद्रों को पुट्टी से भरना।
- पानी और जंग के कारण खराब हुई दीवार को साफ करना।
5) प्राइमर लगाना :
- प्राइमर रंग का आधार होता है, इसे सही तरीके से लगाने पर रंग अच्छी तरह चढ़ता है।
- रोलर या ब्रश की सहायता से प्राइमर लगाना।
- प्राइमर में आवश्यकतानुसार पानी मिलाना (1 लीटर प्राइमर में 200 मिली पानी)।
- प्राइमर को 6 से 8 घंटे तक सूखने देना।
6) रंग लगाने की विधि :
- पहला थर – ब्रश या रोलर से प्रारंभिक परत लगाई जाती है।
- दूसरा थर – पहला थर पूरी तरह सूखने के बाद दूसरा थर लगाया जाता है।
- फिनिशिंग – अच्छी और सटीक फिनिश प्राप्त करने के लिए अंतिम परत लगाई जाती है।
7) सुरक्षा और सावधानियाँ :
1.सेफ्टी बेल्ट और हेलमेट का उपयोग करना।
2.हाथों के दस्ताने और मास्क का उपयोग करना।
3.रंग आँखों या त्वचा पर न लगे, इसका ध्यान रखना।
4.सीढ़ी पर चढ़ते-उतरते समय सावधानी बरतना।
5) ईंट निर्माण
निर्माण कार्य क्या है?
निर्माण कार्य का अर्थ है भौतिक संरचनाओं का निर्माण या उभार करने की प्रक्रिया। इसमें भवन, पुल, सड़कें, बांध आदि का निर्माण किया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को ही निर्माण कार्य कहा जाता है।
1) निर्माण में महत्वपूर्ण बॉन्ड के प्रकार :
- स्ट्रेचर बॉन्ड (Stretcher Bond):
इस प्रकार में ईंटों को उनकी लंबी साइड (लंबाई की दिशा) से एक-दूसरे के ऊपर रखकर निर्माण किया जाता है। - हेडर बॉन्ड (Header Bond):
इस बॉन्ड में प्रत्येक ईंट को उसकी चौड़ी साइड से रखा जाता है और उसी अनुसार संरचना तैयार की जाती है। - इंग्लिश बॉन्ड (English Bond):
इसमें एक पंक्ति स्ट्रेचर बॉन्ड की और अगली पंक्ति हेडर बॉन्ड की होती है। यह बहुत मजबूत निर्माण माना जाता है। - फ्लेमिश बॉन्ड (Flemish Bond):
इस प्रकार में प्रत्येक पंक्ति में स्ट्रेचर और हेडर ईंटें एक के बाद एक उलट-पलट कर लगाई जाती हैं।
2) निर्माण के लिए आवश्यक अनुपात (प्रमाण) :
हर निर्माण कार्य में सही अनुपात बहुत महत्वपूर्ण होता है और उसे सही विधि से उपयोग करना चाहिए।
- सीमेंट और रेत का अनुपात (मोर्टार रेशियो):
उदाहरण: ईंट का काम – 1:6
(1 घमेला सीमेंट : 6 घमेला रेत) - प्लास्टरिंग:
1:4
(1 घमेला सीमेंट : 4 घमेला रेत) - कंक्रीट मिश्रण का अनुपात :
• साधारण निर्माण के लिए – 1:2:3
(1 घमेला सीमेंट : 2 घमेला रेत : 3 घमेला गिट्टी)
• मजबूत आर.सी.सी. के लिए – 1:1.5:3
(1 घमेला सीमेंट : 1.5 घमेला रेत : 3 घमेला गिट्टी)
R.C.C. का पूरा नाम: रिइनफोर्स्ड सीमेंट कंक्रीट (Reinforced Cement Concrete)
3) आवश्यक साधन :
- हाथगाड़ी
- फावड़ा
- रेत, सीमेंट, डस्ट
- ईंटें
- थापी (तसला/ट्रॉवेल)
- घमेला
4) चेंबर तैयार करना :
इसके बाद चेंबर का निर्माण किया गया और अंत में प्लास्टर किया गया।
पाइप की जगह का निरीक्षण किया गया।
पाइप की सुरक्षा और साफ-सफाई के लिए उपयुक्त चेंबर बनाया गया।
अनुपात 1:6 लिया गया
(1 घमेला सीमेंट और 6 घमेला क्रश/रेत)।
निर्माण स्थान पर पहले पानी डाला गया, फिर सामग्री मिलाई गई और ईंटों को पानी में भिगोया गया।
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6) प्लंबिंग
नल-कार्य (प्लंबिंग) किसी भी इमारत या घर में जल आपूर्ति व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण भाग है। इसमें पानी की सप्लाई, गंदे पानी और शौचालय के पानी की निकासी, पाइप फिटिंग, नल लगाना तथा उनकी देखभाल और मरम्मत शामिल होती है। इसी प्रक्रिया को नल-कार्य (प्लंबिंग) कहा जाता है।
1) नल-कार्य के मुख्य घटक :
• पाइप्स: इनमें PVC, GI, HDPE, CPVC पाइप्स शामिल होते हैं।
GI का अर्थ है गैल्वनाइज्ड आयरन (Galvanized Iron)।
• फिटिंग्स: टी, एल्बो, एंड कैप, कपलर, यूनियन।
• वाल्व और टैप: गेट वाल्व, चेक वाल्व, बॉल वाल्व।
• पंप और टंकियाँ: पानी के संग्रहण और ऊपर उठाने (पंपिंग) के लिए।
• FT/MT: फ्लोर ट्रैप / मैनहोल ट्रैप।
2) सामग्री :
- PVC पाइप (½ इंच / 15 mm)
- वाल्व (बॉल वाल्व)
- रॉकेट / रैकेट (1 नग)
- सर्विस सैडल – पाइप के साइज अनुसार (50 mm से 20 mm)
- टेफ्लॉन टेप
- सोल्यूशन (गोंद)
- हैक्सॉ
- स्पैनर
3) पाइपलाइन लगाना :
- पुरानी पाइपलाइन होने के कारण नई पाइपलाइन लगाना आसान रहा।
- इसके बाद ½ इंच पाइप को आवश्यक माप के अनुसार काटा गया।
- पाइप जोड़ते समय एक बॉल वाल्व लगाया गया, बीच में सॉकेट फिट किया गया और GI पाइप पर सर्विस सैडल लगाया गया।
- सभी जोड़ों पर अच्छी तरह सोल्यूशन लगाया गया।
4) जांच की गई :
- पाइपलाइन और चेंबर की जांच की गई।
- 3–4 बार पाइप में लीकेज हुआ, समस्या समझ में नहीं आ रही थी, बाद में सर्विस सैडल बदल दिया गया।
- उसके बाद पानी का कोई लीकेज नहीं हुआ।
नोट:
• U (PVC) – घरेलू प्लंबिंग के लिए
• C (CPVC) – गर्म पानी की प्लंबिंग के लिए
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7) मिलिंग मशीन
उद्देश्य:
विभिन्न आकारों और जटिल यांत्रिक भागों का निर्माण करना। मिलिंग मशीन का उपयोग सामग्री पर कटिंग, शेपिंग और मिलिंग के लिए किया जाता है। जिन भागों में जटिल आकार और उच्च स्तर की सटीकता (Accuracy) की आवश्यकता होती है, उनके निर्माण के लिए मिलिंग मशीन का उपयोग किया जाता है।
सामग्री:
मिलिंग मशीन, कटिंग टूल, स्टूल, लकड़ी, ब्लोअर, जॉब, चाबी (की) और सुरक्षा उपकरण।
प्रक्रिया:
मशीन चालू रहते समय यदि मशीन से धुआँ निकलता दिखाई दे, तो उस पर फूंक नहीं मारनी चाहिए, क्योंकि इससे आग लगने की संभावना रहती है।
सबसे पहले मशीन चालू करने से पहले पूरी तरह से सफाई की गई।
सभी सुरक्षा उपकरण (सेफ्टी गियर) पहने गए, उसके बाद ही मशीन के पास जाया गया।
लकड़ी के टुकड़े को मशीन में सही तरीके से लगाया गया और उसे टाइट किया गया।
स्टूल (टेबल) के माप के अनुसार उसे एडजस्ट किया गया और सही तरह से फिट किया गया।
इसके बाद धीरे-धीरे मशीन को फॉरवर्ड मूवमेंट दिया गया और फिर उसे वापस वर्टिकली ऊपर लाया गया।
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8) लेथ मशीन
लेथ मशीन का उद्देश्य:
लेथ मशीन का उपयोग लकड़ी या लोहे पर फिनिशिंग करने तथा उन्हें आवश्यक आकार देने के लिए किया जाता है।
सामग्री:
वर्नियर कैलिपर, लेथ मशीन, सामग्री – सिलेंडर आकार का लकड़ी का टुकड़ा।
प्रक्रिया:
लकड़ी के टुकड़े की 4 सेमी फिनिशिंग करनी थी। लेथ मशीन का उपयोग करते समय सुरक्षा उपकरण पहने गए। इसके बाद लेथ मशीन में ऑयलिंग और ग्रीसिंग की गई। टूल पोस्ट पर टूल बिट लगाया गया। चक में लकड़ी का टुकड़ा अच्छी तरह से फिक्स किया गया। उस पर मृत केंद्र (डेड सेंटर) लगाया गया। मशीन चालू करके धीरे-धीरे टूल पोस्ट को आगे बढ़ाया गया।
लेथ मशीन में उपयोग होने वाले टूल / ऑपरेशन :
• फेसिंग (Facing):
लेथ ऑपरेशनों में फेसिंग पहली प्रक्रिया होती है। इसमें धातु या लकड़ी के सिरे को अक्ष के समकोण (90°) में समतल करने के लिए सिरा काटा जाता है।
• टेपरिंग (Tapering):
टेपरिंग में कंपाउंड स्लाइड की सहायता से धातु या लकड़ी को शंकु (कोन) के आकार में काटा जाता है।
• पैरलल टर्निंग (Parallel Turning):
यह एक महत्वपूर्ण लेथ ऑपरेशन है, जिसमें वर्कपीस को उसकी पूरी लंबाई में समान व्यास (समान मोटाई) में घुमाकर काटा जाता है।
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9) नींव की लेआउट
उद्देश्य:
नींव की लेआउट तैयार करना अर्थात नींव का सही आकार, रचना और संरचना निर्धारित करना। इस प्रैक्टिकल का मुख्य उद्देश्य नींव की लेआउट के माध्यम से माप, कोण (एंगल) और नींव की सही स्थिति को समझना है।
• नींव की लेआउट का अर्थ है नींव की सही योजना, रचना और संरचना तैयार करना।
सामग्री:
पेपर, पेंसिल, स्केल, रबर, टेप, गज (मेज़र), ओलंबा (प्लंब बॉब), गुणा/डोरी, पावडर (मार्किंग के लिए), कोण मापक (एंगल प्रोट्रैक्टर)।
प्रक्रिया:
इसके बाद पक्की मार्किंग की गई और चैनल के लिए निर्धारित आठ स्थानों पर गड्ढे खोदे गए।
सबसे पहले नींव की लेआउट के लिए आवश्यक सभी सामग्री एकत्र की गई।
सबसे पहले दी गई आकृति (ड्रॉइंग) को देखा गया और उसके अनुसार लंबाई व चौड़ाई समझी गई।
इसके बाद मेज़र टेप से माप लिया गया तथा लंबाई और चौड़ाई के अनुसार जमीन पर चूने/पाउडर से मार्किंग की गई।
फिर लाइन डोरी और गज की सहायता से मार्किंग की गई और 90 डिग्री का समकोण (काटकोन) बनाया गया। साथ ही डायगोनल माप चेक किया गया।
सभी माप सही आने के बाद नींव की पूरी आखणी (लेआउट) की गई।
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10) सनमिक शीट लगाना
उद्देश्य:
सनमिक शीट लगाने का मुख्य उद्देश्य दीवारों या सतहों को आकर्षक, टिकाऊ और आमतौर पर जंग, घर्षण या अन्य बाहरी प्रभावों से सुरक्षित बनाना है।
यह घर, कार्यालय या अन्य संरचनाओं में सजावट के लिए तथा दीवार या टेबल पर सुरक्षा देने के लिए इस्तेमाल की जाती है।
सामग्री:
सनमिक शीट, पेंसिल, क्लॉथ, कटर, स्क्रू, मापने की टेप, गोंद, एब्रो टेप, ड्रिल मशीन, टेबल बेस।
प्रक्रिया:
टेबल के बेस पर उलटा बेस लगाकर स्क्रू से फिक्स किया गया।
सबसे पहले टेबल की सफाई की गई और उसे अच्छी तरह पोंछा गया।
इसके बाद टेबल के माप लिए गए और माप के अनुसार मार्किंग की गई।
सनमिक शीट को माप के अनुसार काटा गया और उसे साफ किया गया।
गोंद लगाने के लिए प्लेटफॉर्म पर गोंद लगाया गया।
सभी जगह गोंद अच्छे से लगाया गया और शीट को टेबल पर रखा गया। इसके बाद एब्रो टेप से सही तरह दबाया गया।
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11) प्लाज्मा कटर
प्लाज्मा कटर एक प्रकार का कटिंग टूल है, जिसका उपयोग धातु के पार्ट्स को काटने या विभिन्न डिज़ाइन बनाने के लिए किया जाता है। यह उपकरण प्लाज्मा आर्च (Plasma Arc) तकनीक पर काम करता है, जिसमें उच्च तापमान वाली आयोनाइज्ड गैस (प्लाज्मा) का प्रवाह धातु को पिघलाकर और उड़ाकर काटता है।
प्लाज्मा कटर से 0.1 mm से लेकर 8 mm तक की पतली शीट काटी जा सकती है।
डिज़ाइन के अनुसार कटिंग के लिए SolidWorks या AutoCAD पर डिज़ाइन तैयार की जाती है।
मुख्य भाग:
- पावर सप्लाई (Power Supply)
- एयर कम्प्रेसर (Air Compressor)
- टॉर्च (Torch)
- नोज़ल (Nozzle)
- कंट्रोल पैनल (Control Panel)
- ग्राउंड क्लैम्प (Ground Clamp)
- इलेक्ट्रोड (Electrode)
प्रक्रिया:
- सबसे पहले सुरक्षा उपकरण पहने – ग्लव्स और ट्रांसपेरेंट गॉगल।
- फिर कट करने के लिए धातु की शीट को रखा।
- ग्राउंड क्लैम्प जोड़ा और एयर सप्लाई चालू की। इसके बाद एयर कम्प्रेसर चालू किया।
- प्लाज्मा कटर चालू किया और कंट्रोल सेटिंग्स की जांच की।
- डिज़ाइन को शीट पर लगाया और शीट सही स्थिति में है या नहीं, यह सुनिश्चित किया।
- मशीन को चलाकर कटिंग की और 12 पीस शिड़ी (सीढ़ियाँ) के लिए कटिंग की।
फायदे:
कम तापमान प्रभाव क्षेत्र, जिससे धातु पर न्यूनतम गर्मी असर।
तेज़ और सीधा कटिंग।
कम खर्च।
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